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आभार..........

बुधवार, 6 जुलाई 2011

आँख खुली जब मेरी

जीवन के पहले प्रभात में आँख खुली जब मेरी |
तब से ही घेरे है मुझको भगवन! माया तेरी ||
जो अब तक अदृष्ट रहे थे उनने मुझको घेरा |
करते विविध कल्पना सुन्दर कहते मेरा मेरा ||||

इन संबंधो की छाया में संसार बना जग सारा |
 माया रही प्रसविनी इसकी हुआ जनों का प्यारा ||
अज्ञान-तिमिर ने मुझको घेरा मर्म जन नहीं पाया |
देता रहा दुहाई जग में संबंध ग्रसित जग पाया ||||

ये संबंध त्रिविध कहलाते कंटक कुसुम घने हैं |
फिर भी करते व्यथित ह्रदय को, बरु सुख शोक सने हैं ||
भावाभाव अनुभूत रहे हैं, फिर भी जकड़ा रहता |
एक बार पंकिल में फंस कर बोलो कौन उबरता ||||

मैं अनाम नाम दिया इन उत्सव हुए घनेरे |
भूल गए ये सभी सुधि जन, बने मूढ़ता चेरे ||
किसको दिया नाम मनोहर तन को अथवा मुझको |
मैं तो देखा नहीं इन्होने यही है अचरज मुझको ||||

श्रुति गोचर कर नाम देह का मैं भी सक्रीय होता |
दुरत्त्या है माया तेरी,      सब ही खाते गोता ||
 इस शक्ति को बुला प्रभु अब चित शक्ति मुद दे दे |
अभिज्ञान कर तेरा प्रभुवर,अभिज्ञान निज दे दे ||||

बचपन खेला कूदा मन से खाया और गंवाया |
तरुनाई तरुनी की तरनी भंवर सिंधु भरमाया ||
पार हुआ ना उसमें तैरा, मोद शोक को जाना |
विष्णु प्रिय से प्रेम किया बस,फिर भी रहा अजाना ||||

 मैं मैं करते सबको देखा मैं का मर्म  पाया |
कौन रहा 'मैं' और कहाँ है, इसको नहीं बताया ||
यह अबूझ है गूढ़ पहेली,रही अनुत्तर भगवन |
बिना कृपा तेरी, ऐसी  ही सदा रहेगी भगवन ||||

मनस्ताप अनुताप भरा मन किंचित चैन  पाता |
ज्यों ज्यों करे प्रयास सुलझ का त्यों त्यों उलझा जाता ||
मन तो मन ही है प्राकृत,नित  नव  स्वप्न दिखाता   |
निराकार साकार मानकर उसमें गोते खाता ||||

करता कलित कल्प्ना कल,फिर भी कल नहीं पाता |
मंजुल मोदक मन के खाता,मोद नहीं दुःख पाता ||
तृष्णा मृग सा घूमा करता,प्यास कहाँ बुझ  पाती |
 नभिस्तिथ मंजुल महक करती भ्रमित, पाती ||||

ह्रदय दरी में दुरा हुआ है विरला जन ही जाने |
विविध पंथ जो प्रचलित करते,इसे कभी ना माने ||
 भव भव में है मग्र स्वयं ही पर को नित्य डुबाते |
 चकाचौंध सांसारिक माया पड़े,देख नहीं पाते ||१०||

मूढ़ बुढ़ापा आता सब पर, देह क्षीण कर देता |
प्रबल प्रहारक होता रुज दल,दुष्ट कष्ट तन देता ||
यह प्रभाव शाश्वत जड़ता का, नहीं जानता कोई |
वर्म बनी रहती तव माया, नहीं जताता कोई ||११||

क्या अपराध दोष क्या मन का, अनुभूत क्यूँ होते |
निष्क्रिय होती देह कहो तब क्यूँ अनुभूत होते ||
तेरी शक्ति से सक्रीय है , शक्ति रहित निष्क्रिय है |
चाहे लाख प्रयास करें जन तब भी तन निष्क्रिय है ||१२||

तब इच्छा आधीन शक्ति तब शक्ति वशी तन होता |
उसको नाम दिया है सुन्दर, प्रख्यात वाही जग होता ||
ब्रह्म शक्ति ही 'मैंहै प्यारे, मैं कहती है शक्ति |
मर्म ना जाना इसका जग ने चिर अदृष्ट है शक्ति ||१३||

अलग अलग है शक्ति देही, यथा गेह गृह स्वामी |
नश्वर गेह प्राकृत चिर जड़ है अविनाशी घर स्वामी ||
रहता पड़ा यहीं पर यह तन,त्याग जात जब स्वामी |
होते दुखी सभी प्रिय रोतेनिज मानें जग स्वामी ||१४||

शक्ति से ना विलग शक्ति प्रभु दाहकता पावक से |
चन्दन से ज्यों गंध दूर ना लाली ज्यों जावक से ||
निम्ब विटप से दूर कटुता नहीं ईख से मधुपन |
चंचलता ना दूर दाम से नहिं गति से मारुत मन||१५||

तृण पत्ता हिलता ना जग में, बिन इच्छा के तेरी |
रोम रोम कण कण में बस्ता लीला रही घनेरी ||
निविड़ निशा में ज्योति समानी , भानु रही ज्यों तेरी |
अंतिम निशि में आँख मुदे जबज्योति लखुं तब तेरी ||१६||   

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी काव्यात्मक पोस्ट .एक आर्काइव रच रहें हैं आप भारतीय काव्य -कारों की .आभार और बधाई . Friday, August 26, 2011
    Saturday, August 27, 2011
    प्रच्छन्न लेखक .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

    ram ram bhai

    उत्तर देंहटाएं

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