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डॉ शंकर लाल चतुर्वेदी ''सुधाकर" |
मंगलाचरण
पावौं मैं सम्पति सुभग, सुन सर्वग्य सुजान |
नित नित नूतन नय मिलै, एक दन्त द्युतिमान ||
एक दन्त द्युतिमान, मान, धन, विद्या, शाला |
कर कुठार कलकंज, शत्रु अघ काल कराला ||
'शंकर' शुभ पद वंदि, माथ प्रभु ताहि मनावौं |
लम्बोदर हेरम्भ, चपरि मैं निधि-सिधि पावौं ||
काश्मीर का नाम तो सर्वविदित है | उसका महत्व अपने में सुरक्षित है | यही वह भूमि है जहाँ मानव का प्रथम पदार्पण हुआ एवं सृष्टि की श्रंखला आगे बढ़ी |
इसका उल्लेख वैदिक ग्रन्थ, पुराण साहित्य सभी ग्रंथो में पाया जाता है | यद्यपि कश्मीर के बारे में मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में बहुत कुछ सुना तथापि सन १९६५ ई के भारत - पाक युद्ध काल में इसकी ओर अभिरूचि विशेष हुई | उसी समय कवि सुलभ प्रकृति के कारण मैंने कुछ छंदों की रचना की, मेरे स्मृति पटल पर 'कश्मीर' नामक चलचित्र की कथा शनै: शनै: अंकित होने लगी | मैंने जिज्ञासा के रूप में कश्मीर से सम्बंधित साहित्य पढ़ा और उस ज्ञान को काव्य रूप में निबद्ध करता रहा |
सन १९७२ के दिसंबर महीने में जब संगर के रूप में पाक देश ने आक्रमण किया तो बांग्ला देश की राज्य क्रांति एवं अत्याचार मेरे ह्रदय को द्रवित कर उठे और देशभक्ति एवं मानवता की भावना से कुछ पंक्तिया लिख डाली | इसी समय मेरे ह्रदय में कवित्व भावना सक्रिय हुई और सभी काव्यांशों को जोड़कर 'कश्मीर के प्रति' - एक खंड काव्य के रूप में निबद्ध किया | इस काव्य में पांच सर्गों में कश्मीर के सम्बन्ध में अपनी भावना व्यक्त की गयी है| जिसमे कश्मीर गौरव, १९४८-४९ का पाक-युद्ध , १९६५ का भारत-पाक रण, बांग्ला देश का अनाचार एवं सन ७१ का पाक आक्रमण एवं भारत विजय का उल्लेख किया गया है |
इस काव्य को जनता के समक्ष प्रस्तुत करने की इच्छा बलवती हुई| इस सम्बन्ध में मैंने आदरणीय विंग कमांडर श्री यूo चंद्रा महोदय एवं कश्मीर निवासी ठाo श्री करनदेव सिंह जी से परामर्श किया जिन्होंने मेरे विचार को उचित बतलाते हुए मुझे यथा संभव प्रोत्साहन एवं सहयोग प्रदान किया| अतः उनके प्रति मैं अपना आभार प्रकट करता हूँ | साथ ही विद्वत-वियत-विधु डॉ आर o एन o सफाया को भी धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता जिन्होंने मुझे तदर्थ आज्ञापित कर मेरे मार्ग को प्रशस्त किया | होशियारपुर निवासी श्री गुरुदासजी ठेकेदार एवं 'गोपाल साहित्य सदन' को भी मैं भुला नहीं सकता जिनके सहयोग से इस काव्य का प्रकाशन संभव हुआ | अंत में श्री आर o के o चड्ढा महोदय को धन्यवाद करते हुए पाठक वृन्द से निवेदन करता हूँ की यदि किसी कारणवश कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा करेंगे और अधिकाधिक इसे अपना कर मुझे प्रोत्साहन प्रदान करेंगे |
विनीत
डॉ शंकर लाल चतुर्वेदी ''सुधाकर"